सुकून की चंद घड़ियाँ हैं, साथ मेरी तन्हाई है,
एक ठंडी हवा का झोंका है, जो मेरे रूह से मिलने आई है ।
अतीत के बेनाम कुछ लम्हें हैं, भविष्य के अंजान कुछ इरादे हैं,
ज़िन्दगी को तोलने की एक तराज़ू है, अपनों से किये अधूरे वादे हैं ।
तनहाई के इस आलम में, अपनी हदें टटोलता हूँ मैं,
प्यार, कभी दोस्ती तो कभी रिश्तों की सरहदें टटोलता हूँ मैं ।
तलाश है उसकी मुझे शायद, जो मेरे अन्दर छुपा बैठा है,
दुनिया की चकाचौंध से दूर वो, गुमनामी के घुप अँधेरे में खोया वो,
डरा सा, सहमा सा! मेरे खुदगर्ज़, मेरे बनावटी व्यक्तित्व से भयभीत वो,
कभी कभी आवेश में आवाजें निकालता है, चीखता है, चिल्लाता है, यदा-कदा रोता भी है।
काश दो कान मेरे अन्दर भी होते, उसकी आवाज भी मैं सुन पाता,
उसकी हताश चीखों को सुन, उस तक पहुँचने की कोशिश करता ।
खैर! तलाश है, ज़ारी रहेगी! शायद राह चलते किसी की मदद मिल जाए ।
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